🏦 RBI के सामने नई चुनौती: बैंकिंग सिस्टम में ₹10.3 लाख करोड़ की अतिरिक्त नकदी, महंगाई पर बढ़ सकता है दबाव
RBI के सामने बड़ी चुनौती! बैंकिंग सिस्टम में ₹10.3 लाख करोड़ की अतिरिक्त लिक्विडिटी, जानिए ज्यादा पैसा क्यों बन सकता है परेशानी
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने इन दिनों मौद्रिक नीति से जुड़ी एक अलग तरह की चुनौती खड़ी हो गई है। बैंकिंग सिस्टम में अत्यधिक लिक्विडिटी यानी नकदी की उपलब्धता तेजी से बढ़ गई है। 3 सितंबर 2026 तक बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी करीब ₹10.3 लाख करोड़ पहुंच गई, जो मई 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।
इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त नकदी का मतलब है कि बैंकों के पास कर्ज देने और अन्य निवेश के लिए बड़ी रकम उपलब्ध है। लेकिन समस्या यह है कि अगर RBI ने इस अतिरिक्त पैसे को समय रहते नहीं सोखा, तो ओवरनाइट ब्याज दरें रेपो रेट से नीचे जा सकती हैं और आगे चलकर महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
💰 आखिर बैंकिंग सिस्टम में इतना पैसा आया कहां से?
इस अतिरिक्त लिक्विडिटी के पीछे सबसे बड़ा कारण RBI की US Dollar-Rupee Forex Swap Facility से आया भारी विदेशी मुद्रा प्रवाह है।
31 अगस्त 2026 तक इस विशेष स्वैप सुविधा के जरिए करीब $136.377 बिलियन का विदेशी मुद्रा प्रवाह आया। इसमें अकेले FCNR(B) deposits से $127.226 बिलियन जुटाए गए।
इन डॉलर को भारतीय बैंकिंग सिस्टम में बदलने पर उसके बदले रुपये जारी हुए। यही रुपये घरेलू बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी के रूप में आए।
इसके अलावा RBI के विदेशी मुद्रा संचालन ने भी सिस्टम में रुपये की उपलब्धता बढ़ाई है।
📈 अगस्त में सरप्लस लिक्विडिटी तीन गुना से ज्यादा बढ़ी
अगस्त 2026 में बैंकिंग सिस्टम में औसत दैनिक अतिरिक्त लिक्विडिटी करीब ₹3.67 लाख करोड़ रही। जुलाई में यह आंकड़ा लगभग ₹1.07 लाख करोड़ था।
यानी सिर्फ एक महीने में औसत अतिरिक्त लिक्विडिटी में जबरदस्त उछाल देखने को मिला।
इससे बैंकिंग सिस्टम में ऐसी स्थिति बन रही है जहां बैंकों के पास उपलब्ध पैसा अपेक्षाकृत कम मांग वाले निवेश और कर्ज अवसरों का पीछा कर रहा है।
⚠️ RBI के लिए ज्यादा पैसा क्यों है समस्या?
सामान्य तौर पर बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी मानी जाती है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए पैसा रहता है और क्रेडिट फ्लो बेहतर हो सकता है।
लेकिन जरूरत से ज्यादा लिक्विडिटी होने पर दूसरी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
1. 📉 Overnight interest rates गिर सकती हैं
जब बैंकों के पास बहुत ज्यादा नकदी होती है, तो उन्हें एक-दूसरे से पैसा उधार लेने की जरूरत कम पड़ती है। इससे मनी मार्केट में ब्याज दरों पर नीचे की ओर दबाव बनता है।
नतीजतन, ओवरनाइट रेट RBI के रेपो रेट से काफी नीचे जा सकती है।
यह RBI की मौद्रिक नीति के प्रभाव को कमजोर कर सकता है।
2. 🔥 महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है
अगर सिस्टम में बहुत ज्यादा पैसा उपलब्ध है और वह अर्थव्यवस्था में तेजी से घूमने लगता है, तो मांग बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में अगर सप्लाई उसी गति से नहीं बढ़ती, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसी वजह से RBI को ऐसी स्थिति से बचना होगा जहां अत्यधिक लिक्विडिटी भविष्य में inflationary pressure को बढ़ाए।
3. 📊 मौद्रिक नीति का असर कमजोर हो सकता है
RBI जब रेपो रेट के जरिए ब्याज दरों को नियंत्रित करता है, तो उसका उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम की दरों को प्रभावित करना होता है।
लेकिन अगर बाजार में बहुत ज्यादा अतिरिक्त पैसा मौजूद हो, तो बाजार की दरें अपने आप नीचे रह सकती हैं। इससे RBI के policy rate का transmission कमजोर हो सकता है।
🚨 दिसंबर तक ₹13-14 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है Core Liquidity
CareEdge Ratings के अनुमान के मुताबिक अगर RBI ने पर्याप्त liquidity management operations नहीं किए, तो दिसंबर 2026 के अंत तक core liquidity करीब ₹13-14 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है।
मिड-अगस्त में core liquidity लगभग ₹8.1 लाख करोड़ थी।
इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में RBI के सामने अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने की चुनौती और बड़ी हो सकती है।
हालांकि, कुछ ऐसे कारक भी हैं जो इस अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम कर सकते हैं।
🎆 फेस्टिव सीजन में बढ़ेगी नकदी की मांग
त्योहारी सीजन में आमतौर पर लोगों की ओर से नकदी की मांग बढ़ती है।
CareEdge के अनुमान के अनुसार दिसंबर तक Currency in Circulation (CiC) में जून के स्तर की तुलना में करीब ₹1.1 लाख करोड़ की वृद्धि हो सकती है।
इससे बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त लिक्विडिटी का कुछ हिस्सा बाहर निकल सकता है।
इसके अलावा RBI की डॉलर फॉरवर्ड बुक की मैच्योरिटी भी सिस्टम से कुछ लिक्विडिटी खींच सकती है।
💵 RBI के पास कौन-कौन से विकल्प हैं?
RBI के पास अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने के लिए कई उपकरण मौजूद हैं। इनमें से कुछ का इस्तेमाल अभी से किया जा रहा है।
🔹 1. VRRR Auctions
Variable Rate Reverse Repo (VRRR) RBI का प्रमुख liquidity absorption tool है।
इसमें बैंक अपना अतिरिक्त पैसा RBI के पास पार्क करते हैं और बदले में ब्याज प्राप्त करते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक RBI ने लगातार कई VRRR ऑपरेशन किए हैं, जिनमें:
- 7-दिन का ₹6 लाख करोड़ VRRR ऑपरेशन
- ओवरनाइट ₹4 लाख करोड़ ऑपरेशन
- इसके बाद ₹5 लाख करोड़ और ₹6 लाख करोड़ के ओवरनाइट ऑपरेशन
शामिल रहे हैं।
इसका मकसद सिस्टम से अतिरिक्त पैसा अस्थायी तौर पर निकालना है।
🔹 2. OMO Sales
RBI Open Market Operations (OMO) के जरिए सरकारी प्रतिभूतियां बेच सकता है।
जब बैंक और वित्तीय संस्थान इन सिक्योरिटीज को खरीदते हैं, तो उनके पास मौजूद पैसा RBI के सिस्टम में वापस चला जाता है।
इससे अतिरिक्त लिक्विडिटी को अपेक्षाकृत टिकाऊ तरीके से कम किया जा सकता है।
🔹 3. CRR बढ़ाना
Cash Reserve Ratio (CRR) बढ़ाना अतिरिक्त लिक्विडिटी को स्थायी रूप से सोखने का एक प्रभावी तरीका माना जाता है।
फिलहाल CRR 3% of NDTL है। इसमें बढ़ोतरी करके RBI बैंकों के पास उपलब्ध कुछ रकम को रिजर्व के रूप में अपने पास रखने के लिए बाध्य कर सकता है।
हालांकि CRR में तेज बढ़ोतरी से बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग लागत और क्रेडिट उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
🔹 4. Incremental CRR
RBI जरूरत पड़ने पर Incremental Cash Reserve Ratio (I-CRR) जैसे उपायों का इस्तेमाल भी कर सकता है।
इसका इस्तेमाल पहले भी असाधारण रूप से अधिक लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के लिए किया जा चुका है।
हालांकि, बाजार इसे RBI के पहले के कुछ liquidity-related फैसलों को आंशिक रूप से वापस लेने के संकेत के रूप में देख सकता है।
📊 एक नजर में समझिए पूरा मामला
| मुद्दा | स्थिति |
|---|---|
| बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी | ₹10.3 लाख करोड़ |
| स्थिति | मई 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर |
| अगस्त औसत दैनिक surplus | ₹3.67 लाख करोड़ |
| जुलाई औसत surplus | ₹1.07 लाख करोड़ |
| Forex swap से कुल inflow | $136.377 बिलियन |
| FCNR(B) से inflow | $127.226 बिलियन |
| संभावित दिसंबर core liquidity | ₹13-14 लाख करोड़ |
| मौजूदा CRR | 3% |
🏦 RBI के सामने असली चुनौती क्या है?
RBI के लिए चुनौती सिर्फ अतिरिक्त पैसा निकालने की नहीं है। असली चुनौती यह है कि लिक्विडिटी को इस तरह नियंत्रित किया जाए कि ब्याज दरों में अचानक तेज उछाल न आए और सरकारी बॉन्ड मार्केट भी अस्थिर न हो।
एक तरफ बहुत ज्यादा लिक्विडिटी से बाजार दरें नीचे जा सकती हैं और महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।
दूसरी तरफ अगर RBI बहुत तेजी से पैसा निकालता है, तो बाजार में अचानक liquidity crunch पैदा हो सकता है और ब्याज दरों पर ऊपर की ओर दबाव आ सकता है।
यानी RBI को “बहुत ज्यादा पैसा” और “बहुत कम पैसा” के बीच संतुलन बनाना होगा।
🌍 वैश्विक स्तर पर भी चुनौती
यह स्थिति ऐसे समय में बनी है जब दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अभी भी महंगाई को लेकर सतर्क हैं और ब्याज दरों में जल्दबाजी से कटौती करने से बच रहे हैं।
भारत में भी अगर महंगाई आगे बढ़ती है, तो RBI की Monetary Policy Committee के सामने ब्याज दरों को लेकर कड़े फैसले लेने का दबाव बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में MPC सदस्यों के हवाले से बताया गया है कि यदि headline inflation 2026-27 की तीसरी तिमाही में करीब 5.9% तक पहुंचती है, तो साल के दौरान दर बढ़ाने का मामला सामने आ सकता है।
📌 Bottom Line
बैंकिंग सिस्टम में ₹10.3 लाख करोड़ की अतिरिक्त लिक्विडिटी फिलहाल RBI के लिए बड़ी चुनौती है। इसका बड़ा हिस्सा भारी विदेशी मुद्रा प्रवाह और RBI के forex operations से आया है। RBI VRRR जैसे उपायों से अतिरिक्त पैसा सोख रहा है, लेकिन यदि surplus आने वाले महीनों में और बढ़ता है तो OMO sales, CRR या Incremental CRR जैसे कदमों पर भी विचार करना पड़ सकता है।




