⚡ पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को बड़ा उलटफेर देखने को मिला। मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की पार्टी All India Trinamool Congress में आधिकारिक तौर पर बड़ी टूट सामने आ गई है।
सोमवार को पार्टी से निष्कासित किए गए विधायक Ritabrata Banerjee को 58 बागी विधायकों ने विधायक दल का नेता घोषित कर दिया। बागी विधायकों ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष Rathindra Bose से मुलाकात कर समर्थन पत्र भी सौंप दिया।
🚨 नए गुट का गठन
बागी खेमे ने अपने संगठनात्मक ढांचे का भी ऐलान कर दिया है।
📌 ऋतब्रत बनर्जी – विधायक दल के नेता
📌 जावेद खान – उपनेता
📌 संदीपन साहा – उपनेता
📌 सिउली साहा – उपनेता
📌 अखरुज्जमान – चीफ व्हिप
हालांकि बागी गुट ने अपने पत्र में ममता बनर्जी को अब भी पार्टी अध्यक्ष माना है, लेकिन उन्होंने Abhishek Banerjee के नेतृत्व और विधायक दल से जुड़े फैसलों को मानने से साफ इनकार कर दिया है।
📝 फर्जी हस्ताक्षर विवाद से शुरू हुई बगावत
पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब अभिषेक बनर्जी के लेटरहेड पर विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए एक प्रस्ताव में Sobhandeb Chattopadhyay को नेता विपक्ष बनाने की सिफारिश की गई।
इसके बाद विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने आरोप लगाया कि उस प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से लगाए गए हैं।
शिकायत के बाद पार्टी नेतृत्व ने दोनों विधायकों को निष्कासित कर दिया, जिसके बाद बगावत खुलकर सामने आ गई।
🔥 ममता ने भंग कीं सभी कमेटियां
पार्टी में बढ़ते संकट को देखते हुए ममता बनर्जी ने बड़ा फैसला लेते हुए राज्य की सभी पार्टी कमेटियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।
🏛️ अब TMC पूरे संगठन के पुनर्गठन की तैयारी कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पार्टी के भीतर बढ़ती असंतोष की लहर को नियंत्रित करने की कोशिश हो सकती है।
📊 क्या महाराष्ट्र जैसा होगा बंगाल?
58 विधायकों का समर्थन मिलने का दावा राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह संख्या TMC के विधानसभा दल में दो-तिहाई के करीब बताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समर्थन कायम रहता है तो पश्चिम बंगाल में महाराष्ट्र मॉडल जैसी स्थिति बन सकती है, जहां बड़े पैमाने पर विधायकों के अलग होने से पार्टी में विभाजन हुआ था।
🎯 आगे क्या?
अब सबकी नजर विधानसभा अध्यक्ष के फैसले और बागी गुट की अगली रणनीति पर है।
यदि बागी खेमे का दावा सही साबित होता है, तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकता है।







