देश के पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों में इस बार मुद्दों का फोकस पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। जहां पहले चुनावों में सड़क, रोजगार और विकास जैसे मुद्दे प्रमुख होते थे, वहीं इस बार राजनीति का केंद्र अस्मिता, पहचान और संस्कृति बन गया है।
🏛️ बंगाल में पहचान बनाम पहचान की राजनीति
West Bengal के चुनावी माहौल में इस बार विकास के बजाय पहचान की राजनीति ज्यादा देखने को मिल रही है।
राजनीतिक दल अब राष्ट्रवाद, धर्म और स्थानीय अस्मिता को लेकर जनता को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।
Bharatiya Janata Party (BJP) जहां बहुसंख्यक वोटरों को साधने के लिए सीमा सुरक्षा और घुसपैठ जैसे मुद्दे उठा रही है, वहीं Trinamool Congress (TMC) भाजपा पर बंगाली पहचान को कमजोर करने का आरोप लगा रही है।
🌏 असम में भी वही मुद्दे हावी
Assam में भी चुनावी माहौल पहचान और अस्मिता के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma लगातार घुसपैठ और UCC जैसे मुद्दे उठाकर “असमिया पहचान” को बचाने की बात कर रहे हैं।
वहीं विपक्ष इन बयानों को राजनीतिक ध्रुवीकरण (polarization) से जोड़कर देख रहा है।
🌴 दक्षिण भारत में भी बदला चुनावी नैरेटिव
Tamil Nadu में हिंदुत्व बनाम द्रविड़ पहचान की राजनीति चुनावी केंद्र में है।
- DMK भाषा और संस्कृति पर जोर दे रही है
- BJP हिंदुत्व के मुद्दे के साथ चुनावी मैदान में है
इसी तरह Kerala में भी धर्म और परंपरा से जुड़े मुद्दे चुनावी चर्चा में बने हुए हैं।
⚖️ क्या बदला है इस बार?
👉 पहले: विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर
👉 अब: पहचान, धर्म, संस्कृति
विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जहां पार्टियां भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दों के जरिए वोटर्स को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं।
🧠 Expert View
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि “अस्मिता की राजनीति” चुनावों में नया नहीं है, लेकिन इस बार इसका प्रभाव कई राज्यों में एक साथ और ज्यादा गहराई से दिख रहा है।









