अरावली संरक्षण विवाद
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अरावली संरक्षण विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्यों बढ़ी हलचल?

अरावली की पहाड़ियों पर फिर चर्चा क्यों तेज़? एक प्रस्ताव से संरक्षण की मुहीम तेज़

देश की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली रेंज हाल ही में फिर सुर्खियों में है। वजह है वह प्रस्ताव, जिसमें अरावली क्षेत्र में निर्माण और खनन गतिविधियों को सीमित करने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव ने राजनीतिक हलकों से लेकर पर्यावरण संगठनों तक में बहस तेज़ कर दी है।

क्या है विवाद का कारण?

नए प्रस्ताव के अनुसार अरावली पहाड़ियों को संरक्षण सूची में शामिल कर संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जा सकता है। इससे खनन, अवैध कटाई और रियल एस्टेट निर्माण पर कड़े प्रतिबंध लग सकते हैं।

इस घोषणा के बाद दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं—

  • पर्यावरण कार्यकर्ता इस कदम को जैव विविधता बचाने के लिए जरूरी मान रहे हैं।
  • वहीं निर्माण उद्योग से जुड़े लोग इसे विकास कार्यों में रुकावट बता रहे हैं।

कैसे बना अभियान संरक्षण का मुद्दा?

कुछ समय से सक्रिय नागरिक समूह, स्थानीय निवासी और NGO मिलकर सोशल मीडिया तथा जमीन पर जन अभियान चला रहे हैं।
मुख्य मांगें हैं—

  • अवैध खनन पर त्वरित रोक
  • हरियाली क्षेत्र को संरक्षित दर्जा
  • पहाड़ियों की सतत निगरानी
  • वन्यजीवों के लिये सुरक्षित गलियारे

जन समर्थन बढ़ने के साथ ही सरकार और प्रशासन पर दबाव बना कि अरावली को संरक्षित किया जाए और प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाए।

अरावली क्यों है अहम?

  • उत्तर भारत की गर्म हवाओं और मरुस्थलीकरण को रोकने में मदद
  • दिल्ली-NCR के भूजल स्तर को रिचार्ज
  • सदियों पुरानी भूगर्भीय संरचना
  • दर्जनों वन्यजीव व पौधों की प्रजातियों का घर

आगे क्या?

अभी प्रस्ताव पर विचार जारी है, लेकिन अरावली संरक्षण एक बड़ा जन आंदोलन बन चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में सरकार संरक्षण नीति, मानचित्रण और प्रतिबंधों पर अंतिम निर्णय ले सकती है।

अरावली पर्वतमाला फिर सुर्खियों में, सुप्रीम कोर्ट की याचिका से सोशल अभियान तेज़

अरावली पर्वत शृंखला, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में गिना जाता है, एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में अरावली क्षेत्र के आसपास चल रही खनन गतिविधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने अपना पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया।

सरकार के इस जवाब के बाद सिलसिलेवार प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं और मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बन गया। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों ने सोशल मीडिया पर “सेव अरावली अभियान” के नाम से मुहिम शुरू कर दी, जिसमें पहाड़ियों के संरक्षण की मांग लगातार उठ रही है।

मुद्दा अब राजनीतिक हलकों तक पहुंच चुका है, जहां इस विवाद के पर्यावरणीय और विकास से जुड़े आयामों पर चर्चाएं तेज़ हो रही हैं। प्रस्तावित खनन रोक और संरक्षण उपायों को लेकर आने वाले समय में अदालत और सरकार की अगली कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

क्या है अरावली पर्वत शृंखला और क्यों मानी जाती है इतनी महत्वपूर्ण?

अरावली पर्वतमाला को पृथ्वी की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल किया जाता है। भूवैज्ञानिक मानते हैं कि इसका निर्माण करीब दो अरब वर्ष पूर्व हुआ था, इसलिए यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला मानी जाती है।

उत्तर भारत की पारिस्थितिकी में अरावली की भूमिका बेहद अहम है। यह पर्वतमाला रेगिस्तान की रेत और तेज़ हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक ढाल का काम करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अरावली मौजूद न होती, तो थार रेगिस्तान उत्तर दिशा की ओर बढ़कर हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्सों को प्रभावित कर सकता था।

थार और गंगा के मैदानों के बीच जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी इसका योगदान महत्वपूर्ण है। यह पर्वत श्रृंखला भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवाटर रिचार्ज), वनस्पतियों, वन्यजीवों और जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

दिल्ली से लेकर गुजरात तक लगभग 650 किलोमीटर के विस्तार वाली यह रेंज प्राकृतिक विविधता और पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से एक मजबूत आधार है। अरावली ही कई नदियों—जैसे चंबल, साबरमती और लूनी—का उद्गम स्रोत भी मानी जाती है।

इसके अलावा अरावली क्षेत्र में चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट सहित कई प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। लेड, जिंक, कॉपर, सोना एवं टंगस्टन जैसे धातुओं के भंडार भी यहां मौजूद हैं, जिसके कारण इस इलाके में खनन गतिविधियां होती रही हैं।

अरावली पर संकट गहरा रहा है: दिल्ली-NCR की पर्यावरणीय सुरक्षा पर खतरा

अरावली पर्वतमाला को दिल्ली और उत्तर भारत का मौन संरक्षक माना जाता है, लेकिन लगातार खनन गतिविधियों ने इसके अस्तित्व को चुनौती दे दी है। पर्वतों में मौजूद खनिज संसाधनों के कारण यह क्षेत्र वर्षों से दोहन का केंद्र रहा है।

इतिहास में अरावली से सीमित खनन होता था, मगर पिछले चार दशकों में रेत, पत्थर और खनिजों के बड़े पैमाने पर उत्खनन ने हालात बदल दिए। बढ़ते खनन के चलते धूल और वायु प्रदूषण बढ़ा और यह समस्या दिल्ली तथा आसपास के राज्यों तक फैलकर वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) को खराब करने लगी।

इसका असर सिर्फ हवा तक सीमित नहीं है। लगातार खनन के कारण भूजल स्तर और प्राकृतिक जलस्रोतों पर भी दबाव बढ़ा है, जिससे जल संरक्षण और जल पुनर्भरण की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो रही है।

इन्हीं पर्यावरणीय जोखिमों को देखते हुए समय–समय पर अरावली के कई हिस्सों में खनन पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसके बावजूद अवैध खनन और निगरानी की कमी के कारण यह पर्वतमाला अब भी गंभीर खतरे का सामना कर रही है।

अरावली संरक्षण विवाद : मुद्दा आखिर क्या है? (Rewritten, copyright-free)

1990 के दशक

अरावली क्षेत्र में बढ़ते खनन पर रोक लगाने के लिए 90 के दशक में नियम लागू किए गए। इन नियमों के बाद केवल उन्हीं परियोजनाओं को खनन की अनुमति दी गई जिन्हें सरकार ने औपचारिक मंजूरी दी थी। बाकी क्षेत्रों में खनन प्रतिबंधित कर दिया गया।

2009 में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली संरक्षण को लेकर बड़ा निर्णय देते हुए हरियाणा के कई जिलों—जैसे गुरुग्राम, फरीदाबाद और मेवात—में खनन पर पूर्ण रोक लगा दी।

2024 का नया आदेश

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला के संपूर्ण क्षेत्र में नए खनन पट्टों और पुराने पट्टों के नवीनीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही केंद्रीय समिति को अरावली रेंज की विस्तृत जांच करने के निर्देश दिए गए।

2025 में क्या हुआ? समिति की चेतावनी और सरकारी पहल

मार्च 2025

पर्यावरण संरक्षण समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट सुझाव दिए कि अरावली के संवेदनशील इलाकों में खनन गतिविधियाँ पूरी तरह रोक दी जाएँ। समिति ने पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों और खनन पट्टों पर कड़े नियम लागू करने की सिफारिश की।

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जब तक अरावली पर्वतमाला की सभी राज्यों में पूरी भौगोलिक मैपिंग और उसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन नहीं हो जाता, तब तक नए खनन पट्टों को मंजूरी न दी जाए और पुराने पट्टों का नवीनीकरण भी रोका जाए।

जून 2025

केंद्र सरकार ने एक नई योजना—हरित दीवार परियोजना—की शुरुआत की। इसका उद्देश्य अरावली क्षेत्र से जुड़े चार राज्यों के 29 जिलों में पर्वतमाला के आसपास पाँच किलोमीटर चौड़े ग्रीन बफर ज़ोन विकसित करना है।

सरकार का दावा है कि इस पहल से 2030 तक लगभग 2.6 करोड़ हेक्टेयर खराब भूमि को पुनर्जीवित किया जा सकेगा और पर्यावरणीय सुरक्षा मजबूत होगी।

अरावली फिर क्यों चर्चा में?

हालिया सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अरावली रेंज की पहचान में राज्यों और विशेषज्ञ संस्थाओं के बीच बड़े अंतर हैं। अदालती टिप्पणी के अनुसार अलग-अलग संस्थाएं अलग परिभाषाएँ और मानक इस्तेमाल कर रही हैं।

2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) ने अरावली पर्वत की पहचान के लिए यह मानक तय किए थे—

  • पहाड़ी की ढलान तीन डिग्री से अधिक हो
  • ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा हो
  • दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से कम हो

लेकिन वास्तविकता यह है कि कई ऊँची पहाड़ियाँ इन मापदंडों में फिट नहीं बैठतीं। यही असमानताएँ विवाद का मूल कारण बन गईं, और अरावली संरक्षण का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर फिर चर्चा में आ गया।

अरावली की नई परिभाषा पर विवाद तेज़, सुप्रीम कोर्ट समिति की रिपोर्ट स्वीकार

‘अरावली बचाओ’ अभियान के बीच राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गए हैं। कुछ नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि “अगर अरावली सुरक्षित रही, तभी दिल्ली-NCR की पर्यावरणीय रक्षा संभव है।”

इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), संबंधित राज्यों के वन विभागों और अपनी नियुक्त समिति के सदस्यों को शामिल करते हुए एक नई विशेषज्ञ समिति गठित की। इस समिति को अरावली पर्वतमाला की स्पष्ट वैज्ञानिक परिभाषा तय करने का जिम्मा सौंपा गया।

2025 में समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी। 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया। रिपोर्ट में कहा गया कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भूभाग को ही अरावली पर्वत शृंखला के अंतर्गत माना जाए।

हालांकि, इस परिभाषा पर असहमति भी सामने आई। अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर ने दलील दी कि यह मानक अरावली की निम्न ऊंचाई वाली पहाड़ियों को पर्वत श्रेणी से बाहर कर देगा और उन क्षेत्रों में खनन के रास्ते खुल सकते हैं। इससे पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

दूसरी ओर, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने तर्क रखा कि FSI की पुरानी परिभाषा अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबंधात्मक थी। उनकी राय में समिति द्वारा प्रस्तावित 100 मीटर की सीमा व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से अधिक उपयुक्त है।

अरावली संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: प्रबंधन योजना और राजनीतिक बहस तेज़

सुप्रीम कोर्ट ने राय सुनने के बाद अरावली पर्वतमाला के बेहतर प्रबंधन के लिए एक समग्र योजना तैयार करने को कहा। इस योजना के अंतर्गत उन क्षेत्रों की पहचान की जाएगी जहाँ खनन को पूर्ण रूप से रोका जाए, और उन इलाकों का निर्धारण भी होगा जहाँ केवल नियमन के तहत सीमित खनन की अनुमति दी जा सके। फिलहाल, कोर्ट ने सभी नए खनन पट्टों को मंजूरी देने पर रोक जारी रखी है।

100 मीटर की परिभाषा का कितना असर?

अरावली का कुल विस्तार 800 किलोमीटर से अधिक है, जिसमें से लगभग 550 किलोमीटर हिस्सा राजस्थान में आता है। विशेषज्ञों के अनुसार अरावली सिर्फ ऊँचाई का मामला नहीं, बल्कि एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र है।

सरकारी और तकनीकी अध्ययनों का दावा है कि राजस्थान में मौजूद अरावली की लगभग 90% पहाड़ियों की ऊँचाई 100 मीटर से कम है। यदि नई परिभाषा लागू होती है, तो केवल 8-10% पहाड़ियाँ ही कानूनी रूप से ‘अरावली’ मानी जाएंगी—बाकी संभवतः संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकती हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार पर्वतों का नुकसान स्थायी प्रभाव छोड़ता है। एक बार चट्टानें टूट गईं और जलग्रहण तंत्र नष्ट हो गया, तो उसे पुनर्जीवित होने में सदियाँ लगती हैं। इसलिए अरावली संरक्षण केवल अदालत और सरकार का नहीं, समाज का सामूहिक दायित्व है।

तकनीकी तर्क और पुरानी सिफारिशें

GSI के पूर्व महानिदेशक दिनेश गुप्ता ने बताया कि वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्रों में खनन की सीमा तय करने के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की समिति गठित की थी। उस समिति ने 100 मीटर कंटूर स्तर को पैमाना मानने की सिफारिश की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार भी किया।

उन्होंने कहा कि इस विवाद में कुछ बयान भ्रम फैलाने वाले हैं क्योंकि रेगिस्तान के विस्तार के कई कारण होते हैं और इसे केवल खनन से जोड़ना सही नहीं।

राजनीति में क्यों छिड़ी बहस?

अरावली संरक्षण अब जन अभियान का रूप ले चुका है, जिसे सोशल मीडिया पर “सेव अरावली” के नाम से बढ़ावा मिल रहा है। राजस्थान में इस मुहिम को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नेतृत्व दे रहे हैं।

गहलोत का कहना है कि अरावली भारत की ‘ग्रीन वॉल’ है, जो थार रेगिस्तान की गर्म हवाओं और रेत को दिल्ली, हरियाणा और यूपी की ओर बढ़ने से रोकती है। उनका तर्क है कि छोटी पहाड़ियाँ भी श्रृंखला की कड़ी हैं, और ढलानों व जलधाराओं में बदलाव से भूजल पुनर्भरण और इको सिस्टम पर गंभीर असर पड़ेगा।

गहलोत ने चेताया कि यदि छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोल दिया गया, तो तापमान में तेज़ वृद्धि, जल संकट और जैव विविधता पर भारी खतरा पैदा होगा, क्योंकि अरावली ही NCR सहित कई शहरों के लिए प्रदूषण–रोधी प्राकृतिक ढाल है।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

बीजेपी ने इस मुद्दे पर कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगाया। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि गहलोत सरकार ने स्वयं 2002 में भूमि सुधार संबंधी रिपोर्ट पेश की थी, और अब वही विरोध दर्ज करा रहे हैं।

इसके विपरीत, भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी सरकार की नीति पर सवाल उठाए। पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए, क्योंकि अरावली को केवल ऊँचाई के तकनीकी पैमाने से सीमित करना उचित नहीं है।

उनका कहना है कि रिज संरचनाएँ, छोटी पहाड़ियाँ और जुड़ा भूभाग पारिस्थितिकी और जल संरक्षण की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि कानूनी मान्यता का दायरा संकरा हुआ, तो दशकों में विकसित पर्यावरण सुरक्षा ढाँचा कमजोर पड़ सकता है।

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